ज़ोर से बोलो तो ज़माना सुनेगा

नफ़ासत का ओढ़ा हुआ पुलिंदा लग रहा था । शख़्स की ज़ुबान से नाम ऐसे छलक रहे थे जैसे महल की सीढ़ियों से शख़्सियतें उतर रही हों । ऐसा लगा कि कोई मुझे उन नामों के बीच बाँध कर ले जाने आया है । उसने क़दर में भी कोई कमी नहीं की । फिर क्यों जाते जाते कह गया कि आपका शो देखा जाता है । आपको समझना चाहिए । जो तटस्थ हैं समय लिक्खेगा उनका भी अपराध । मेरा क्या अपराध हो सकता है और यह कोई कवि कह रहा है या किसी का कोतवाल । मैं कहां गया और किससे मिला इसमें उसकी दिलचस्पी कमाल की थी । धीरे से कही गई वो बात कविता तो नहीं ही थी । धमकी ? 

कहीं जाता हूँ ऐसा लगता है कि कोई निगाह रख रहा है । यार दोस्तों को बताता हूँ तो सब सतर्क रहने को कहते हैं । फ़ोन पर बात नहीं करने को कहते हैं । मैं फ़ोन पर उतना ही आयं बायं सायं करने लगता हूँ ।वो मेरा प्राइवेट स्पेस है । आजकल कई लोग ऐसी धमकियाँ देते हैं । उन्हें लगता है कि मैं कुछ फ़ेमस हो गया हूँ और वे मुझे मेरे 'नाम' का डर दिखा देंगे । उन्हें नहीं मालूम कि मै ऐसी लोकप्रियता पर रोज़ गोबर लीप कर सो जाता हूँ । 'वायरल' कर देंगे । हँसी आती है ऐसी बातों पर । घंटा । ऐसे लोग और ऐसी डरों को सटहां ( डंडा) से रगेद देता हूँ । चिन्ता मत कीजिये यह तथाकथित लोकप्रियता मेरे लिए कबाड़ के बराबर है । कुछ और कीजिये डराने के लिए ।

जहाँ जहाँ लोगों से घिरा रहता हूँ तो ऐसा क्यों लगता है कि कुछ कैमरे मुझसे चाहत के नतीजे में रिकार्ड कर रहे हैं । ऊपर वाले ने इतनी तो निगाह बख़्शी है । हम बाघ बकरी नहीं हैं ,कबूतर हैं । अंदेशों की आहट समझ लेते हैं । पहले बहस के लिए छेड़ते हैं फिर रिकार्ड करते हैं । यह प्रवृत्ति दिल्ली और सोशल मीडिया से शुरू हुई थी जो गाँवों तक पसर गई है । वैसे पहले भी देखा है ऐसा माहौल ।

ऐसा क्या अपने आप हो रहा होगा । किसी गाँव में भीड़ अपनी बात कह रही होती है । सब तरह की बातें । अचानक एक दो लोग उसमें शामिल होते हैं और नारे लगाने लगते हैं । भीड़ या तो संकुचित हो जाती है या नारे लगाने लगती है । उन एक दो लोगों के आने के पहले भी लोग बोलते हुए एक दूसरे को देखते रहते हैं कि उसकी बात सुनकर ये या वो बता तो नहीं देगा । फिर एक या दो लोग ज़ोर ज़ोर से बोलने लगते हैं । यही होगा । जाइये । यहाँ सब वही है । सारे लोग चुप हो जाते हैं । मेरा कैमरा ऐसी मुखर आवाज़ों से भर जाता है । वहाँ खड़ी भीड़ के बाक़ी लोग दबी ज़ुबान में बात करने लगते हैं । धीरे से कहते हैं नहीं ऐसा नहीं होगा । ये बोल रहे हैं ठीक है सबको बोलना है ।आप एकतरफ़ा सुनकर लौटते हैं ।

इसीलिए मतदान से पहले जनमत जानना बेकार है । विज्ञापन ऐसा ताक़तवर माहौल रच देता है कि कमज़ोर मज़बूत को देख कर बोलने लगता है । सब वही बोल रहे हैं जो सब सुनना चाहते हैं । इतने शोर शराबे के बीच एक भयानक खामोशी सिकुड़ी हुई है । या तो वो मुखर आवाज़ के साथ है या नहीं है लेकिन कौन जान सकता है । क्यों लोग अकेले में ज़्यादा बात करते हैं । चलते चलते कान में कुछ कहते हैं । धीरे धीरे यह नफ़ासत दूसरे लोग भी सीखने लगे हैं । अब मतदान केंद्र पर बूथ लूटना नहीं होता । वो उसके मोहल्ले में ही लूट लिया जाता है । टीवी को भी एक लठैत ही समझिये।  


काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में बातचीत चल रही थी । हर तरह की बात । दिल्ली से आए पत्रकार से जानने बहस करने की उत्सुकता में । छात्रों की प्रखरता और मुखरता पर भावुक हुआ जा रहा था । सोच रहा था कि अलग अलग तरीके से सोचने वाले ये छात्र हिन्दुस्तान का शानदार भविष्य हैं । अचानक एक दो लोग मुखर हो जाते हैं । सारे लोग फिर से चुप या सतर्क । एक ही तरह की आवाज़ किसी भीड़ की विविधता को क्यों ख़त्म कर देती है । एक ही तरह की आवाज़ हूट करती है । भीड़ में घुसकर नारे बोलने लगती है । एक शख़्स किनारे खड़े मेरे सहयोगी से कहता है कि रवीश जी इनकी बाइट चलायेंगे तो 'वायरल' कर दूँगा । यह शख़्स नक्सल समर्थक है । यू ट्यूब से निकाल कर वायरल कर दूँगा । फिर उस शख़्स जैसे कुछ और लोग भीड़ में शामिल हो जाते हैं । कर दो भाई 'वायरल '। दलाल और हत्यारा कहाकर लोग मत्री बन जाते हैं । लोग उनके नारे लगाते हैं । माला पहनाते हैं । यह भी कोई शर्मिंदा होने की बात है । धमकियाँ ऐसी दीजिये कि उसे आप अकेले किसी चौराहे पर मेरे सामने दोहरा सके । प्यारे भीड़ पर इतना मत उछलो । भीड़ में उछलने की तुम्हारी इस कमज़ोरी को अपनी बाँहों में भर कर दूर कर दूँगा । आके गले मिलो और महसूस कर जाओ मैं कौन हूँ । 

अक्सर बोलने वाला ताक़तवर की तरह क्यों प्रदर्शित करता है । कौन लोग हैं जो इनबाक्स या ब्लाग के कमेंट में डराने की भाषा में बात कर जाते हैं । यह जाना पहचान दौर इतिहास में पहले भी गुज़रा है और ग़ायब हो गया है । आता रहता है और जाता रहता है । इसीलिए मैं सतर्क नहीं हूँ पर बेख़बर भी नहीं ।





विज्जी और बनारस

सफ़ेद मगर मटमैली हो चुकी इस मूर्ति को देख कर लगा कि अंबेडकर की है । हैरान मन तेज़ निगाह से देख रहा था कि आख़िर कौन हो सकता है जो बनारस के अस्सी घाट जाने के रास्ते पैड और बैट के साथ खड़ा है । कार रोक दी मैंने । तस्वीर लेने के लिए पीछे आ रही गाड़ियों की पीं पां झेलते हुए सड़क पार कर गया । ये तो विज्जी है । ऐसा नहीं कि मैं उन्हें पहचानता था पर मूर्ति के नीचे लिखा पढ़ कर मैं एक ऐसे बनारस में चला गया जिसकी बात ही कोई नहीं करता ।

मैंने अपनी ज़िंदगी में चंद राज्यों के ही शहर देखे हैं । कहीं किसी शहर में क्रिकेटर की मूर्ति नहीं देखी । बनारस में देखी । विज्जी और बनारस । हमने कभी विज्जी के बहाने बनारस के बारे में सोचा ही नहीं था । विजयनगरम के महाराज की मूर्ति । मूर्ति के नीचे लिखा पढ़ने लगा । काशी के मैदान में विज्जी की टीम ने एम सी सी इंग्लैंड की टीम को हराया था । बस इस एक सूचना ने बनारस के बारे में बार बार बनाई जा रही एकरसीय छवि को पलट दिया । मैं उस दौर में चला गया जब विज्जी की यह जीत बनारस को बताये बिना गुज़र गई होगी । तब क्रिकेट इतना लोकप्रिय था कहाँ । फिर भी कल्पना करने के पैसे नहीं लगते । कुछ तो होंगे जो भाग कर इस मैच को देखने गए होंगे । इस शहर के वे कौन से बड़े लोग रहे होंगे जिन्होंने उस मैच को देखा होगा । विज्जी को देखने वाले बनारसियों की स्मृतियाँ कहाँ दर्ज पड़ी होंगी । 



विज्जी न्याय मंत्री रहे हैं । विधानसभा के सदस्य रहे हैं । क्रिकेट बोर्ड के उपाध्यक्ष से लेकर अध्यक्ष तक रहे हैं । उन लोगों का शुक्रिया जिन्होंने अस्सी घाट जाने के रास्ते पर विज्जी की मूर्ति लगाई । मुझे नहीं मालूम कि किन लोगों ने यह मूर्ति लगाई और लगाने का इतिहास क्या है मगर बनारस के इतिहास के इस सफ़ेद पन्ने को देख मियाज़ हरिहर हो गया । विज्जी के बारे में ज़्यादा नहीं जानता लेकिन विज्जी ने मेरे लिए बनारस को नया कर दिया । जो लोग बनारस को जानने का दावा करते हैं दरअसल वो बनारस के बारे में उतना ही जानते हैं । बनारस आएं तो ऐसे टूरिस्ट गाइड टाइप बनारसियों से बचने से बचें जो बनारस के बारे में सब जानते हैं । बनारस को खुद की नज़र से देखिये । इस शहर के वजूद में सिर्फ बाबा फ़क़ीर और कबीर नहीं हैं विज्जी भी हैं । 

बनारस की तस्वीरें






योगेंद्र यादव

बनारस का विरोध रस

बनारस इस चुनाव का मनोरंजन केंद्र बन गया है । बनारस से ऐसा क्या नतीजा आने वाला है जिसे लेकर कृत्रिम उत्सुकता पैदा की जा रही है । यहाँ का चुनाव इस क़दर सांकेतिक हो गया है कि मोदी विरोध नक़ली लगने लगा है । ऐसा लगता है कि कोई रस्म अदा करनी है जिसके लिए बनारस जाना है । मोदी को हराने बनारस जाना है । मोदी विरोधी कार्यकर्ता उस कर्मकांड को पूरा करने का भ्रम पाल चुके हैं जिसे बनारस में कोई गंभीरता से नहीं लेता ।

क्या मोदी सिर्फ बनारस में लड़ रहे हैं ? क्या इसी एक सीट से सरकार का फ़ैसला होने जा रहा है । क़रीब चार सौ सीटों पर बीजेपी लड़ रही है । क्या वहाँ मोदी नहीं हैं । मोदी ने खुद से लड़ने के लिए साल भर का मौक़ा दिया । वो सितम्बर से अभियान पर हैं । सैंकड़ों रैलियाँ कर चुके हैं । विरोधियों के पास इतना लंबा वक्त था । मोदी ने प्रोपैगैंडा किया तो वे क्या कर रहे थे । उन्हें किसने रोका था जनता के बीच जाकर बताने के लिए । क्या वे गए । मोदी जीत के लिए नए नए गठबंधन बना रहे हैं और विरोधी आपस में लड़ने के लिए बेताब हैं । मोदी का लक्ष्य साफ़ है मगर विरोधी को पता नहीं कि पहले मोदी से लड़े या सपा से सीपीएम से या बसपा से या किसी से । विरोधी आपस में लड़ते हुए मोदी से लड़ने का स्वाँग रचा रहे हैं । क्या लेफ़्ट के लिए सोशल मीडिया नहीं बना है । मोदी का विरोध करने वाले सोये रहे । युवाओं को शुरू से ही नकारा बताने लगे । उनसे संवाद का प्रयास नहीं किया । अपने इसी आलस्य पर पर्दा डालने के लिए सब बनारस जा रहे हैं । कान खुजाते हुए ताल नहीं ठोकी जाती । सब लस्सी पीकर और पान खाकर चले आयेंगे । 

ज़ाहिर है मोदी विरोधियों के पास ठोस एजेंडा है नहीं । कम से कम मोदी कर तो रहे हैं कि मुझे मौक़ा दो मैं ये कर दूँगा या वो कर दूँगा । विपक्ष से कौन कह रहा है कि मुझे मौक़ा दो मैं मोदी से भी बेहतर कर दूँगा । विरोधियों को सुनकर जनता किसे चुनें । आप ग़ौर से देखिये मोदी से कोई लड़ ही नहीं रहा । कोई सरकार बनाने का दावा भी नहीं कर रहा है । उनके खेमे में कोई स्पष्टता या रणनीति नहीं है । विरोधी ख़ुद को नहीं जनता को धोखा दे रहे हैं । 

मान लीजिये मोदी बनारस से हार गए और उनकी पार्टी को बहुमत या क़रीब करीब मिल गया । आप नतीजों के दिन कवरेज और अगले दिन अख़बारों के पन्नों की कल्पना कीजिये । जो शख़्स जीत कर शपथ लेने जा रहा होगा उससे जुड़ी ख़बरें होंगी या उस एक सीट की ख़बर होगी जहाँ हार कर भी वह शपथ लेगा । बनारस की हार को दो लाइन जगह नहीं मिलेगी । हफ़्ते भर बाद कहीं विश्लेषण छप जाएगा । फिर बनारस की लड़ाई का क्या महत्व है । विरोध के नाम पर विरोध पर्यटन होने लगा है । 

इसलिए बनारस का महत्व उसी तरह और उतना ही सांकेतिक है जितना विरोधियों को राजनाथ सिंह सुष्मा स्वराज और मुरली मनोहर जोशी से उम्मीद है । विरोधियों में इतनी ईमानदारी तो होनी चाहिए कि वे कह दें कि मोदी नहीं जीते बल्कि हम ही नहीं लड़े ।   हम चाहते थे कि मोदी जीत जायें और विरोध भी दर्ज हो जाए । मोदी विरोधी अस्पष्टता के शिकार हैं । वे हास्यास्पद हो चुके हैं । इतनी मेहनत अगर वे अन्य सीटों पर करते तो नतीजा बदल सकता था । इन्हें इतनी चिंता थी तो क्यों नहीं ये लोग दिल्ली से सटे पश्चिम उत्तर प्रदेश के इलाक़ों में गए जहाँ समाजवादी और भाजपा के नेता आग उगल रहे थे । अमित शाह की ज़ुबान को लेकर हमले हो रहे हैं लेकिन कोई आज़म ख़ान को लेकर समाजवादी पार्टी को क्यों नहीं घेरता । 

इसलिए जो लड़ नहीं रहे थे वे बनारस जा रहे हैं ताकि दिखा सकें कि हम भी मोदी से लड़े थे । बनारस में सब हैं । हम भी हैं । बनारस हिन्दू विश्विद्यालय गया था । खूब बहस हुई छात्रों के बीच मज़ा आ गया । इस बात को लेकर नहीं कि मोदी जीतेंगे या नहीं बल्कि पूरे देश के मुद्दों को लेकर । शानदार कैम्पस है । लड़के लड़कियाँ भी सजग सतर्क । अच्छा लगा कि दिल्ली मुंबई के बाहर भी कुछ अच्छा है । कैम्पस के गलियारे चमक रहे हैं । कैंटीन लगता है किसी कारपोरेट का जलपान गृह है । चाय अच्छी लगी और कटलेट भी । देवी जी से मिला । वहाँ से लौटा तो कैम्पस में ही कोई नेता जी मिलने आ गए । दही लेकर । बेजोड़ दही ।क वहाँ से घाट पर गया तो सीढ़ियों पर मनीष सिसोदिया और आम आदमी पार्टी के कुछ कार्यकर्ता मिले । घाट पर उच्च स्तरीय नींबू की चाय पी गई । झटा झट फोटू खींच लिया गया । फ़ेसबुक पर शेयर हो चुका होगा ! तभी बीजेपी प्रवक्ता नलिन कोहली का फोन आ गया । तब तक अस्सी से पैदल चलकर दशाश्वमेघ घाट जाने का मूड बन चुका था । नाव ली गई और घाट पर गंगा की आरती की दिव्यता में समाहित हो गया । बनारस हो गया । इस पर बाद में लिखूँगा । 

टीवी दिखाता नहीं डराता है

टीवी हांफ रहा है । दमा है या टीबी ये तो ख़ून या बलगम की जाँच से पता चलेगा । टीवी अब साथी कम पार्टी ज़्यादा लगने लगा है । किसी गाँव या शहर में जाइये टीवी को लेकर लोग सवाल करने लगे हैं । टीवी के दो पर्यायवाची शब्द आम फ़हम हो चले हैं । चैनल और सर्वे । मैं जिन लोगों से मिला वो अब पत्रकार को एजेंट के रूप में देखने लगे हैं । सफ़ाई देते देते थक गया कि प्लीज़ ऐसा मत कहिये । जवाब यही कि हम आपको व्यक्तिगत रूप से नहीं कह रहे हैं । उन्हें लगता है कोई गुड्डा हाथ में कैमरा और माइक लिये आ गया है जिसकी डोर किसी और के हाथ में है । मीडिया इतना क्यों दिखा रहा है और एक ही का क्यों दिखा रहा है । "पहले टीवी बताता था, दिखाता था अब टीवी डराता है ।" एक गाँव का बुज़ुर्ग किसी चौमस्की की तरह आराम से कह गया । 

शहर,क़स्बा और गाँव । चाय वाला से लेकर टीचर । कई लोग मिले जिन्हें लगता है कि जो वो कह रहे हैं वो दिखेगा नहीं । इसलिए जो पहले से दिख रहा हैं वही कह रहे हैं । विकास और नेतृत्व जैसे सवालों पर वैसे ही बोल देते हैं जैसे टीवी बोलता है । जैसे टीवी सुनना चाहता है । कैमरा बंद होने के बाद ऐसी कई आवाज़ें सुनने को मिलीं जो अपने ही कहे का उल्टा थीं । लोग भी टीवी से खेल रहे हैं । झट से कोई कार्यकर्ता आम आदमी बन जाता है । बाद में पता चलता है कि वो किसी पार्टी का है । सारे कार्यकर्ताओं को पता है कि चुनाव के टाइम में पत्रकार आ सकता है । गाँव के किसी कोने में शूट कर रहे हैं अचानक पार्टी के लोग चले आते हैं । प्रभुत्व पार्टी के लोग । पीछे से ज़ोर ज़ोर से नारे की शक्ल में बात करने लगते हैं । अचानक भीड़ भी वही बोलने लगती है । टीवी के पैदा विमर्श ने ज़मीन पर ऐसे लोगों का दबदबा बढ़ा दिया है । ऐसे लोगों के आने के बाद लोग चुप हो जाते हैं । उसे ही बोलने देते हैं । जिसे मैं कई बार भरमाना कहता हूँ । जो ऊँचा बोलता है समाज उसे बोलने देता है । लेकिन इसका असर हो रहा है । कई लोग वैसा ही बोलने लगते हैं जैसा बोलने की छूट टीवी पर दिखती है । हम सब एक मीडिया समाज में रहते हैं । यह टीवी का 'बेंग काल' है जहाँ टीवी और उसका दर्शक टर्र टर्र करने लगते हैं । अविश्वसनीय होकर भी टीवी विश्वसनीय माध्यम हो गया है । टीवी इस चुनाव का सबसे सशक्त राजनीतिक कार्यकर्ता है । टीवी के असर को कम मत आँकिये ।

गाँवों में लोग विज्ञापन को लेकर सवाल करते हैं । उन्हें शक है कि जो पत्रकार सामने हैं वो स्वतंत्र है भी या नहीं । "आप अच्छे हैं लेकिन आप जिस सिस्टम में काम करते हैं उस पर आपका कितना बस चलता है ।" यह बात तमाचे की तरह लगी । " कल पुर्ज़ा से कारख़ाना बनता है पर पुर्ज़ा कारख़ाना नहीं होता साहब" ये पंक्ति एक बेरोज़गार युवक की है जिसने सोशल मीडिया पर टीवी की हो रही आलोचना की ज़ुबान को पढ़ा भी नहीं होगा । 

किसी भी दर्शक को ऐसे ही होना चाहिए । इन सब बातों पर तिलमिलाया तो नहीं पर मुस्कुराया ज़रूर । दाँत चियारने के अलावा चारा भी क्या था । कहीं कहीं तो टीवी को लेकर ग़ुस्सा इतना भयानक था कि पूछिये मत । हर आदमी घेरकर यही पूछ रहा था । नाप रहा था कि आप किसकी तरफ़ से बिके हैं । आपका मीडिया बिका हुआ है । बार बार सुनाई दिया । कई लोग मिले जो कहते नज़र आए कि अब तो साहब टीवी बंद कर दिया है । क्या देखना है । वही बातें बार बार । ख़बर तो होती नहीं है । 

'टीवी कम देखिये' मैं रोज़ रात को ट्वीट करता था लेकिन लगता है उन लोगों ने पढ़ लिया जो ट्वीटर पर नहीं टीवी पर हैं । वे टीवी कम देखने लगे हैं । हालाँकि यह भी आँकड़ा आने ही वाला होगा कि चुनाव में टीवी के दर्शकों की संख्या बढ़ गई है । ऐसा होता भी है । टीवी को लेकर सवाल करने वाले ऐसे कितने लोग हैं । पर ऐसे लोगों की तादाद बढ़ने लगी है । 

टीवी उस नेता की तरह है जिसके बारे में सब जानते हैं कि यह किसका एजेंट है, इसके धंधे क्या है, किस चीज़ का माफ़िया है, जात क्या  है, यह कभी हमारा काम नहीं करेगा लेकिन वोट तो लोग उसी नेता को देते हैं । यह अविश्वास से पैदा हुआ प्रेम है !  जैसे राजनीति का विकल्प नहीं वैसे अख़बार टीवी का भी तो नहीं है । सोशल मीडिया ? सोशल मीडिया लोगों का कितना रहा । वहाँ भी वही अख़बार टीवी चल रहा है । हम अख़बार टीवी के बग़ैर नहीं रह सकते । काश के लोग ऐसी नाराज़गी पर केबल कटवा दें और अख़बार बंद कर दें । 

मैं अक्सर कहता हूँ कि किसी वोटर को किसी नेता का फ़ैन नहीं होना चाहिए वैसे ही किसी दर्शक को किसी एंकर या रिपोर्टर का फ़ैन नहीं होना चाहिए । फ़ैन्स बनते ही आप चतुर निगाहों से देखना बंद कर देते हैं । किसी के प्रति लगाव स्वाभाविक है मगर ऐसा भी न हो जो विश्वसनीयता आपके बीच कोई बना रहा है उसका इस्तमाल कोई और कर ले । डेढ़ महीने से अख़बार नहीं पढ़ा हूँ । टीवी नहीं देखा हूँ । अपवादों के चंद मिनटों और पन्नों को छोड़कर मैं भी उन दर्शकों की तरह हो गया हूँ जो टीवी को लेकर सवाल करते हैं । हम सब कृत्रिम रूप से पैदा एक महान विमर्श का पीछा करने वाले लोग हैं । यह बहुत अच्छा है । मीडिया पर अविश्वास लोकतंत्र को समृद्ध करता है । ये वो लोग हैं जो टीवी के बनाए भ्रमजाल से निकल आए हैं और इन लोगों के पास वैकल्पिक विमर्श पैदा करने की ताक़त नहीं है । जैसे नेता वोटर की मजबूरी जानता है वैसे ही टीवी दर्शकों की । बाक़ी तो जो है सो हइये है ।


दर्दे टेम्पो इन बनारस

पेड़ पर बोतल

मार्केटिंग के गुर सिर्फ मुंबई की विज्ञापन कंपनियों को नहीं आते । हिन्दुस्तान के क़स्बों शहरों से गुज़रते हुए एक से एक स्लोगन और सामान बेचने की तरकीब से टक्कर हो जाती है । आज़मगढ़ में एक दुकानदार ने अपने बोतलों को पेड़ पर ही टाँग दिया है ताकि दूर से ही दिख जाए । आसपास की दुकानों से लोहा लेने के लिए उसमें ऐसा किया क्योंकि उसकी दुकान भीतर है और सड़क पर लगे ठेलों के कारण ग्राहक की नज़रों से छिप जाने का ख़तरा है ।






यूपी की सड़क पर गुजरातन अलबेली

चाय


कानपुर लखनऊ राजमार्ग पर यह चाय की दुकान मौजूद है । इस शख़्स को अपनी दुकान के एकांत में इस तरह बैठा देख देर तक देखता रहा । कोई नई बात तो नहीं है । ऐसे लोग तो बहुत हैं । अंतिम आदमी की तरह बैठे इस शख़्स के क़रीब गया तो साँस की तकलीफ़ से काँप रहा था । छाती ज़ुबान को खींच ले रही थी ।

इन्होंने बताया कि दिन में बीस रुपया कमा लें बहुत है । इतनी धूल है कि कोई आता नहीं । बस इस बुढ़ापे में एक जगह मिल गई है । वोट दे देंगे । किसे देंगे मालूम नहीं । अख़बार ख़रीद नहीं सकते । हम तो बस चाय बेचते हैं । इनकी दुकान के वक्त अंबेडकर की एक मूर्ति लगी थी । बिल्कुल इनकी तरह सिकुड़ कर छोटी हो चुकी मूर्ति । मूर्ति के नीचे शराब की छोटी बोतलें गिरी थी । अंतिम आदमी की आँखें नाच रही थीं । हम दोनों एक दूसरे को अपराधी की निगाह से देख रहे थे । 

थोड़ी देर बाद कानपुर इलाहाबाद मार्ग पर शुक्ला ढाबा पर था । वहाँ चाय की यह प्याली आई । पूछा कि नीचे सिल्वर पत्ती क्यों लगी है । प्याला रिस रहा है क्या । नहीं सर । शोभा के लिए है । चाय चाय का फर्क है बाबू ।