एवरेस्ट के नीचे बसपा

"एक बार आप माउंट एवरेस्ट पर पहुँच जाते हैं तो उसके बाद उतरने का ही रास्ता रह जाता है " । यूपी में 2012 के विधान सभा चुनावों से पहले बसपा पर नज़र रखने वाले उस मित्र की बात याद आ रही है । नतीजों के बाद बसपा एवरेस्ट से उतर गई और सपा चढ़ गई । पर ये कहाँ लिखा है कि कोई एवरेस्ट पर दोबारा नहीं चढ़ सकता । यूपी के भीतर बसपा की लड़ाई पर नज़र डालने का वक्त है । क्या बसपा भाजपा को रोक देगी । रोकने वाली ताक़त भी बसपा ही है । भाजपा अपने उछाल के लिए बसपा ही माँगती है ! ये दिल माँगे मोर ।

बसपा इसबार 'चुपचाप' चुनाव लड़ रही है । आख़िर इस रणनीति का बसपा ने क्यों प्रचार किया । टाइम्स आफ इंडिया में बड़ा सा 'चुपचाप रणनीति' पर विश्वेषण छपता है ।'चुपचाप' चुनाव लड़ने का क्या मतलब होता है । क्या बसपा ने 2007 और 2012 का विधान सभा चुनाव भी चुपचाप लड़ा था । याद कीजिये टीवी पर माया सरकार का आठ दस मिनट का लंबा लंबा विज्ञापन । क्या सही में बसपा 'चुपचाप' चुनाव लड़ रही है । यह सही है कि मीडिया बसपा को कम या नगण्य दिखाता है लेकिन इस साल पंद्रह जनवरी को खुद ही मायावती ने कह दिया था कि बसपा के लोग मीडिया और सोशल मीडिया के चक्कर में न पड़ें । मायावती ने मीडिया को इंटरव्यू न देने की बात का एलान भी लखनऊ की रैली में ही कर दिया । पहले तो वो इंटरव्यू देती थीं । जबकि बसपा का अदना सा कार्यकर्ता भी मीडिया में न होने को कमी मान रहा है । कह रहा है कि समय बदल रहा है । टीवी के कारण लोगों को मोदी मुलायम का पक्ष तो मालूम है पर हमारा नहीं । मायावती ने ऐसा निर्णय क्यों लिया ? किसी से बात न करने का निर्णय क्या कुछ सवालों से बचने के लिए था ।

ऐसा भी नहीं कि वे अपने भाषणों में नरेंद्र मोदी से कोई रियायत बरतती हैं । जमकर हमले करती हैं पर यही हमला अन्य माध्यमों से प्रचारित हो जाए तो क्या हर्ज । रोज़ एक प्रेस रीलीज़ तो इनबाक्स में आती ही है जिसमें वो नरेंद्र मोदी की जमकर आलोचना करती हैं । फिर वो सामने से क्यों नहीं लड़ रही हैं । मैं भी नहीं मानता कि चुनाव में मीडिया का इतना असर होता है बशर्ते लड़ने वाला लड़ता रहे । अगर वह लड़ रहा है तो मीडिया का असर नहीं होता । जैसे बिहार में लालू कई जगहों पर मोदी को चुनौती देने की स्थिति में पहुँच गए हैं जबकि मीडिया ने उन्हें ठीक से कवर तक नहीं किया । विशेषकर टीवी मीडिया ने । मायावती के साथ मीडिया की नाइंसाफ़ी को छोड़ दीजिये तो क्या मायावती इस बार मोदी को रोकने के लिए लड़ रही हैं । ना कहने का कोई प्रमाण नहीं है मगर इसबार बसपा को देखकर हाँ भी ठीक से नहीं निकलता ।

लखनऊ में हुई पंद्रह जनवरी की रैली के बाद मायावती चुप हो जाती हैं । दो तीन महीने के बाद जब प्रेस में चर्चा होने लगती है तो प्रेस कांफ्रेंस कर सफ़ाई देती हैं कि वे राष्ट्रव्यापी रणनीति बनाने में व्यस्त हैं । खैर मायावती सभी ज़िलों में रैली तो कर रही हैं और उनकी रैलियों में भीड़ भी आती है । पर भीड़ के आगे क्या । जिन लोगों को मोदी को रोकने को लिए बसपा से उम्मीदें हैं उन्हें बसपा के चुनाव को क़रीब से देखना चाहिए । ज़मीन पर दलित पिछड़ा भाईचारा बनाने में बसपा सक्रिय है क्या । अगर मीडिया की चमक से बचकर बसपा का वोटर नहीं छिटका तो नतीजा कमाल का आएगा ।

बसपा ने इस बार 21 ब्राह्मणों को टिकट दिये हैं जबकि भाजपा ने 19 को । एक दो सीट से ख़ास फ़र्क नहीं पड़ता । सब जानते हैं कि यूपी के ब्राह्मणों का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ है । फिर भी बसपा ने पिछड़ों से ज़्यादा ब्राह्मणों पर भरोसा किया । 2007 में बसपा ने भाईचारा कमेटी बनाकर ब्राह्मणों को उसका अध्यक्ष बनाया था । ब्राह्मणों का पूरा वोट तो नहीं मिला मगर मिला । फूलपुर के एक ब्राह्मण बहुल गाँव में कई पंडितों ने कहा कि सपा को हराने के लिए बसपा को दिया था । वैचारिक तालमेल नहीं था । इस बार भाजपा को देंगे । 2012 के विधानसभा चुनावों में ब्राह्मण बसपा से दूर जा चुका था । बसपा चुनाव हार गई । क्या इस बार ब्राह्मण उम्मीदवार अपनी जाति का वोट ले आएगा जिसे जाटव और मुसलमान मिलाकर जीता देंगे । ऐसा होता दिख नहीं रहा है । ब्राह्मण मतदाताओं में सजातीय उम्मीदवारों के कारण बसपा के प्रति ख़ास उत्साह नहीं दिखता । तो इन इक्कीस ब्राह्मण उम्मीदवारों में से कितने जीतेंगे यह आपको ज़मीन पर दिख जाता है ।

इस बार यूपी की लड़ाई में पिछड़ी जातियों का बड़ा रोल रहेगा । बसपा ने पंद्रह या सत्रह ओबीसी को टिकट दिये हैं जबकि भाजपा ने 28 को । भाजपा के ओबीसी उम्मीदवारों में ग़ैर यादव ओबीसी जातियाँ ज़्यादा हैं । भाजपा ने लोध जाति के नेता कल्याण सिंह और पटेलों की नेता अनुप्रिया पटेल को मिलाकर अपनी ज़मीन मज़बूत की है । कुर्मी पटेल और कुशवाहा मतदाताओं का बड़ा हिस्सा भाजपा की तरफ़ जा रहा है । ये जातियाँ बसपा और सपा में हुआ करती थीं । इनसे पहले भाजपा के साथ रह चुकी हैं । इनका कहना है कि बसपा सपा दोनों अपनी प्रमुख जातियों को ही आगे बढ़ाती रही हैं इसलिए ग़ैर यादव पिछड़ी जातियों का विश्वास बैकवर्ड सोशलिस्ट राजनीति से कम हो गया है । इसमें आर एस एस के प्रयासों को अनदेखा नहीं किया जा सकता । मुलायम सत्रह ओबीसी जातियों को अनुसूचित जाति में डलवाना चाहते हैं और मायावती इसका विरोध करती हैं । उसी तरह से मुलायम मुसलमानों के आरक्षण की बात करते हैं तो संघ या भाजपा ओबीसी को समझाते हैं कि उनके हिस्से से मुसलमानों को जायेगा । जो आरक्षण हिंदुत्व को कमज़ोर करने का हथियार बना था वही मज़बूत करने का औज़ार बन रहा है । मायावती या मुलायम दोनों इस आधार को खिसकने से बचाने के लिए वैचारिक संघर्ष करते नहीं दिख रहे हैं । सिर्फ टिकट देने की औपचारिकता काफी नहीं है ।

" भाई साहब आज भी बहन जी आक्रामक हो जायें तो हम बीजेपी को रोक देंगे" उस कार्यकर्ता को ऐसा क्यों लगा कि चुपचाप की रणनीति पर चल रही बसपा को लाभ नहीं हो रहा है । इतना भी क्या चुपचाप कि किसी को पदचाप तक सुनाई न दे । मतदाता भी न सुन पाये । हर पार्टी अपना अस्तित्व बचाकर रखना चाहेगी । लगातार मत प्रतिशतों में गिरावट का सामना कर रही बसपा के लिए यह चुनाव काफी अहम है । अगर इस चुनाव में बसपा एवरेस्ट पर दोबारा न चढ़ पाई तो तीन साल बाद के विधान सभा चुनाव में भी नहीं चढ़ पाएगी । दिल्ली में बैठे मोदी को 2019 में यूपी की ज़रूरत फिर पड़ेगी । जिस यूपी को इतनी मेहनत से हासिल करेंगे उसे इतनी आसानी से छोड़ देंगे । क्या वे पिछड़ी जातियाँ बसपा की तरफ़ लौट आयेंगी । क्या ब्राह्मण भाजपा को इतनी जल्दी छोड़ देंगे । तब बीजेपी का नारा होगा कि यूपी का विकास तभी होगा जब दोनों सरकार भाजपा की होगी । क्या तब भी बसपा चुपचाप चुनाव लड़ेगी ।

बनारस गए अविनाश दास ने फ़ेसबुक पर बसपा उम्मीदवार के पर्चा भरने की कहानी लिखी है । उम्मीदवार देरी से आता है, बिना किसी दमख़म के आता है । अविनाश लिखते हैं कि कहीं कोई गड़बड़ी तो नहीं  । बिना कांसपिरेसी थ्योरी के कोई चुनावी विश्लेषण पूरा नहीं हो सकता । यह थ्योरी क्या हो सकती है गेस कीजिये । क्या पता बसपा सबको ग़लत साबित कर तीस सीटें ले आये या क्या पता बसपा के कारण किसी को पचास सीटें आ जाये । बसपा ने कमाल कर दिया तो धमाल हो जाएगा और बसपा के कारण कमल खिल गया तो बवाल हो जाएगा । क्या पता किस वजह से किसका क्या हो जाए ।

अन्जान शहीद

आज़मगढ़ ज़िले के एक क़स्बे का नाम है अन्जान शहीद । 1857 की क्रांति के से बहुत पहले अंग्रेज़ों की सेना से लोगों लेते वक्त बड़ी संख्या में लोग शहीद हो गए थे । कहा जाता है कि कई लोगों ने इस तालाब में डुबकी लगा ली और कई लड़ते हुए मारे गए और इसमें फेंक दिये गए । इन शहीदों की पहचान आजतक अन्जान है । तालाब के पानी से न कोई हिन्दू का ख़ून अलग कर सकता है न मुसलमान का । जिन्हें इस देश की बुनियाद रखने में किसी क़ौम की भागीदारी पर शक है वे इस तालाब में गंजी उतारकर नहा लें । इतिहास और लोक विमर्श से ग़ायब कर दिया गया अन्जान शहीद ऐसे शंकाधारियों का इंतज़ार कर रहा है । इस चुनाव में हो रही बेहूदा स्तर की बातें ऐसे क़िस्सों का अपमान करती हैं । वोट के लिए शहादत का हिन्दू मुसलमान करने वालों अन्जान शहीद की पहचान बता दो बस । 


शायर माँ का मन्दिर

नाम देखकर कोई शायर बिला वजह उत्साहित न हो जाए । मैंने भी नाम का मतलब जानने का प्रयास नहीं किया । ज़रूर कोई पाठक इनकी जानकारी दे देगा इस विश्वास से तस्वीर चिपका रहा हूँ । हम पटेल बहुल एक गाँव में गए थे । हो सकता है शायर माँ इस जाति समूह की कुल देवियों में से एक हों जैसा कि कमेंट बाक्स में राजीव रंजन ने भी इशारा किया है । 

बाँटने से पहले बांचने तो दो

जो हो रहा है वो तो हो चुका है

अमरीका में २००८ में राष्ट्रपति का चुनाव हो रहा था । ओबामा अपने विज्ञापन की टीम के साथ बातचीत कर रहे थे । एक बड़े बैंकिंग फ़र्म के ध्वस्त होने की अफ़वाह ज़ोरों पर थी । ओबामा की टीम अमरीका में आ रहे आर्थिक संकट को समझने के लिए विशेषज्ञों के पास रवाना कर दी जाती है । ओबामा अपनी टीम से कहते हैं कि आप लोगों को इसे समझने की ज़रूरत है । अगर आर्थिक संकट आया तो चुनाव हवा हो जाएगा । 

इसी बैठक में एक रणनीति तैयार होती है कि आर्थिक संकट पर लम्बे लंबे भाषण तैयार किये जायें  । टीवी पर पाँच पाँच मिनट के स्पाट ख़रीदें जायें । जिसे एक साथ टीवी और इंटरनेट पर चलाया जाए । बार बार दिखाया जाए ताकि लोग उसके बारे में बात करने लगे । ओबामा के कैंपेन मैनेजर डेविड प्लाफ कहते हैं कि बोलने की शैली ओवल आफिस के अभिभाषण जैसी होनी चाहिए । इस संकट के बहाने हम समाधान और अपने नेतृत्व का लंबा लंबा बखान करेंगे । तय होता है कि टीवी पर तीस सेकेंड के विज्ञापन का कोई मतलब नहीं है । जितने भी ऐसे विज्ञापन चल रहे हैं सब नकारात्मकता से भरे पड़े हैं । डेविड कहते है कि हमारे विज्ञापन में राहत की बात होगी । ( अच्छे दिन आने वाले हैं टाइप) । हम उम्मीद जतायेंगे । 

लेकिन उस वक्त टीवी पर कोई स्पेस खाली नहीं था । रणनीतिकारों ने समझा कि कम ही नेता हैं जो लंबे भाषणों से माहौल रच सकते हैं । उस वक्त मैक्केन टीवी इंटरव्यू और टाउन हाल में दक्ष माने जा रहे थे । डेविड लिखते हैं कि मैक्केन डायरेक्ट टू कैमरा वाले भाषणों में उतने माहिर नहीं थे । कैमरे में आँख मिलाकर भाषण देने में ओबामा माहिर लगते हैं । 

आप इसे प्रसंग को राहुल गांधी की तुलना करते हुए समझिये । इंटरव्यू देने में अरविंद केजरीवाल आगेसनिकल चुके थे । मोदी इंटरव्यू के इस रास्ते को बाद के लिए छोड़ देते हैं । लंबे लंबे भाषण देने लगते हैं ।  कैमरा क्लोज़ में होता है । वे पूरे देश की यात्रा पर निकल जाते हैं । यहाँ भाषण वहाँ भाषण । विरोधी घर बैठे रह जाते हैं । अगस्त से जनवरी तक बिना किसी ठोस चुनौती का सामना किये हुए उनका भाषण एकतरफ़ा लोगों के बीच पहुँचने लगता है । विरोधी गंभीरता से नहीं लेते हैं । घटिया प्रवक्ता भेजते हैं विरोध के लिए । मोदी ज़बरदस्त बढ़त हासिल कर लेते हैं । खैर आगे सुनिये ।

ओबामा कहते हैं कि यह रणनीति अच्छी है । चलो करते हैं । " लोग आर्थिक संकट को लेकर भ्रमित हैं, डरे हुए हैं और निराश हैं । इस तरह के लंबे विज्ञापन से यह सब तो नहीं बदल सकता लेकिन मैं उन्हें यह भरोसा जताते हुए दिखना चाहता हूँ कि मेरे पास इस संकट से उबरने की योजना है, कम से कम इस संकट से निकाल कर मैं उन्हें कुछ राहत तो दे ही सकता हूँ ।"

इसके बाद लंबे विज्ञापनों को चलाने के लिए पैसे जुटाये जाते हैं । ओबामा की टीम इतने पैसे जमा कर लेती है कि डेविड अपनी टीम को कहते हैं कि तुम सब बिगड़ जाओगे । चुनाव प्रचार में इतना पैसा कभी नहीं लगा होगा । ओबामा के लंबे भाषणों को टीवी पर बार बार चलाया जाता है । किस्से कहानियों को मिक्स किया जाने लगता है । हर तरफ़ ओबामा नज़र आने लगते हैं । उम्मीद बेचते हुए ओबामा । पहले कार्यकाल में अमरीका की अर्थव्यवस्था संकट में ही घिसटती रहती है । ओबामा नहीं सँभाल पाते हैं । दूसरा कार्यकाल ख़त्म होने जा रहा है । अमरीकी अर्थव्यवस्था अभी तक सँभल ही रही है ( इसके बारे में कम जानता हूँ ) । ओबामा ने अपनी टीम से ठीक कहा था । भरोसा बेचो । 

जो लोग भारत के इस चुनाव को समझना चाहते हैं उन्हें David plouffe की the audacity to win पढ़नी चाहिए । पेंग्विन ने छापी है । मुझे पढ़ते हुए लगा कि नरेंद्र मोदी का अभियान पूरी तरह से इस किताब से निर्देशित है । एक एक रणनीति मेल खाती है । संयोग भी हो सकता है मगर मैं पूरी तरह ग़लत भी नहीं हो सकता । जिस तरह मोदी के आने से पहले अन्ना और केजरीवाल टीवी के स्पेस में छाये हुए थे उसी तरह ओबामा के आने के पहले हिलेरी क्लिंटन छा गईं थीं । उनकी जीत का इंतज़ार हो रहा था मगर डेविड की टीम ने अपनी प्रचार रणनीति से सबकुछ बदल दिया । हिलेरी अरविंद की तरह हाशिये पर चली गईं और ओबामा अश्वेत, ईसाई, अफ़्रीकी और अमरीकी न जाने क्या क्या और किन किन क़िस्सों में ढाल कर उम्मीद बन गए । चाय वाला का क़िस्सा यू नहीं उभरा होगा । उस मित्र का शुक्रिया जिसने यह किताब भेजी थी । आप सबको पढ़नी चाहिए । एक टीवी क्या क्या कर सकता है । मोदी अकारण साल भर से टीवी पर लंबे लंबे भाषण नहीं दे रहे हैं । ओबामा दे चुके हैं । 

मन का मतदान

इस चुनाव में पीढ़ियों के बीच ज़बरदस्त टकराव हो रहा है । कहीं नौजवान अपने माँ बाप से लड़ कर बीजेपी को वोट कर रहा है तो कहीं पत्नियाँ पतियों से लड़कर आम आदमी पार्टी को । मतलब ये है कि इस बार जो मत पड़े हैं उसमें अपनी आज़ादी और मर्ज़ी से पड़े वोट को भी अलग से गिना जाना चाहिए । 

एक सत्यकथा सुना रहा हूँ । इस बात के बावजूद कि आजकल राजनीतिक दल अपने पक्ष में लिखी बातों को उठाकर प्रचारित करने लगते हैं और उस प्रक्रिया में लिखने वाला संदिग्ध होता चला जाता है । 

महाराष्ट्र का एक क़िस्सा है । एक शौहर ने कहा कि मोदी को वोट दोगी तभी साथ ले जाऊँगा । बीबी कहा कि नहीं जाती तब । उनके जाने के बाद बीबी ने आटो किया । अपनी सहेली को साथ लिया और पहुंच गई मतदान केंद्र । दोनों औरतों ने वोट दिया आम आदमी पार्टी को । वोट देकर घर आई तो बीबी ने शांति बनाए रखने के लिए कह दिया कि मोदी को वोट दे आई हूँ । बाद में उन्होंने किसी को ये क़िस्सा सुनाते हुए कहा कि वोट तो कम से कम अपने मन का दें । इस कहानी में वोट किसे दिया यह महत्वपूर्ण नहीं है । वोट किसी और को देकर मोदी को दिया ये बताना महत्वपूर्ण है । 

जनमत सर्वेक्षण का अंकेक्षण

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ध्यान से देखिये । ये दस साल पहले का कवर पेज है । मोदी विरोधियों की आख़िरी उम्मीद कि इस बार भी सर्वे फ़ेल होंगे । इस चुनाव को 'सेकुलर आलस्य काल ' कहा जाना चाहिए जब सारे हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे । कुछ यूँ समझ के मोदी हारने के लिए दिन रात मेहनत कर रहे हैं । ये आलस्य की इंतहा है । दस साल पहले सर्वे ग़लत हुए थे तो इस बार भी होंगे । कोई यह नहीं बताता कि गुजरात मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ में बीजेपी के लिए सर्वे ग़लत क्यों नहीं हुए । लेकिन दस साल पुराना अनुभव सबक़ के काम तो आ सकता है । आउटलुक का यह कवर डराता है । किसी को गुदगुदा सकता है । काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ती । हर बार ये ग़लत हो ज़रूरी भी तो नहीं । क्या पता इस बार सर्वे का तुक्का सही लग जाए ।

ज़ोर से बोलो तो ज़माना सुनेगा

नफ़ासत का ओढ़ा हुआ पुलिंदा लग रहा था । शख़्स की ज़ुबान से नाम ऐसे छलक रहे थे जैसे महल की सीढ़ियों से शख़्सियतें उतर रही हों । ऐसा लगा कि कोई मुझे उन नामों के बीच बाँध कर ले जाने आया है । उसने क़दर में भी कोई कमी नहीं की । फिर क्यों जाते जाते कह गया कि आपका शो देखा जाता है । आपको समझना चाहिए । जो तटस्थ हैं समय लिक्खेगा उनका भी अपराध । मेरा क्या अपराध हो सकता है और यह कोई कवि कह रहा है या किसी का कोतवाल । मैं कहां गया और किससे मिला इसमें उसकी दिलचस्पी कमाल की थी । धीरे से कही गई वो बात कविता तो नहीं ही थी । धमकी ? 

कहीं जाता हूँ ऐसा लगता है कि कोई निगाह रख रहा है । यार दोस्तों को बताता हूँ तो सब सतर्क रहने को कहते हैं । फ़ोन पर बात नहीं करने को कहते हैं । मैं फ़ोन पर उतना ही आयं बायं सायं करने लगता हूँ ।वो मेरा प्राइवेट स्पेस है । आजकल कई लोग ऐसी धमकियाँ देते हैं । उन्हें लगता है कि मैं कुछ फ़ेमस हो गया हूँ और वे मुझे मेरे 'नाम' का डर दिखा देंगे । उन्हें नहीं मालूम कि मै ऐसी लोकप्रियता पर रोज़ गोबर लीप कर सो जाता हूँ । 'वायरल' कर देंगे । हँसी आती है ऐसी बातों पर । घंटा । ऐसे लोग और ऐसी डरों को सटहां ( डंडा) से रगेद देता हूँ । चिन्ता मत कीजिये यह तथाकथित लोकप्रियता मेरे लिए कबाड़ के बराबर है । कुछ और कीजिये डराने के लिए ।

जहाँ जहाँ लोगों से घिरा रहता हूँ तो ऐसा क्यों लगता है कि कुछ कैमरे मुझसे चाहत के नतीजे में रिकार्ड कर रहे हैं । ऊपर वाले ने इतनी तो निगाह बख़्शी है । हम बाघ बकरी नहीं हैं ,कबूतर हैं । अंदेशों की आहट समझ लेते हैं । पहले बहस के लिए छेड़ते हैं फिर रिकार्ड करते हैं । यह प्रवृत्ति दिल्ली और सोशल मीडिया से शुरू हुई थी जो गाँवों तक पसर गई है । वैसे पहले भी देखा है ऐसा माहौल ।

ऐसा क्या अपने आप हो रहा होगा । किसी गाँव में भीड़ अपनी बात कह रही होती है । सब तरह की बातें । अचानक एक दो लोग उसमें शामिल होते हैं और नारे लगाने लगते हैं । भीड़ या तो संकुचित हो जाती है या नारे लगाने लगती है । उन एक दो लोगों के आने के पहले भी लोग बोलते हुए एक दूसरे को देखते रहते हैं कि उसकी बात सुनकर ये या वो बता तो नहीं देगा । फिर एक या दो लोग ज़ोर ज़ोर से बोलने लगते हैं । यही होगा । जाइये । यहाँ सब वही है । सारे लोग चुप हो जाते हैं । मेरा कैमरा ऐसी मुखर आवाज़ों से भर जाता है । वहाँ खड़ी भीड़ के बाक़ी लोग दबी ज़ुबान में बात करने लगते हैं । धीरे से कहते हैं नहीं ऐसा नहीं होगा । ये बोल रहे हैं ठीक है सबको बोलना है ।आप एकतरफ़ा सुनकर लौटते हैं ।

इसीलिए मतदान से पहले जनमत जानना बेकार है । विज्ञापन ऐसा ताक़तवर माहौल रच देता है कि कमज़ोर मज़बूत को देख कर बोलने लगता है । सब वही बोल रहे हैं जो सब सुनना चाहते हैं । इतने शोर शराबे के बीच एक भयानक खामोशी सिकुड़ी हुई है । या तो वो मुखर आवाज़ के साथ है या नहीं है लेकिन कौन जान सकता है । क्यों लोग अकेले में ज़्यादा बात करते हैं । चलते चलते कान में कुछ कहते हैं । धीरे धीरे यह नफ़ासत दूसरे लोग भी सीखने लगे हैं । अब मतदान केंद्र पर बूथ लूटना नहीं होता । वो उसके मोहल्ले में ही लूट लिया जाता है । टीवी को भी एक लठैत ही समझिये।  


काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में बातचीत चल रही थी । हर तरह की बात । दिल्ली से आए पत्रकार से जानने बहस करने की उत्सुकता में । छात्रों की प्रखरता और मुखरता पर भावुक हुआ जा रहा था । सोच रहा था कि अलग अलग तरीके से सोचने वाले ये छात्र हिन्दुस्तान का शानदार भविष्य हैं । अचानक एक दो लोग मुखर हो जाते हैं । सारे लोग फिर से चुप या सतर्क । एक ही तरह की आवाज़ किसी भीड़ की विविधता को क्यों ख़त्म कर देती है । एक ही तरह की आवाज़ हूट करती है । भीड़ में घुसकर नारे बोलने लगती है । एक शख़्स किनारे खड़े मेरे सहयोगी से कहता है कि रवीश जी इनकी बाइट चलायेंगे तो 'वायरल' कर दूँगा । यह शख़्स नक्सल समर्थक है । यू ट्यूब से निकाल कर वायरल कर दूँगा । फिर उस शख़्स जैसे कुछ और लोग भीड़ में शामिल हो जाते हैं । कर दो भाई 'वायरल '। दलाल और हत्यारा कहाकर लोग मत्री बन जाते हैं । लोग उनके नारे लगाते हैं । माला पहनाते हैं । यह भी कोई शर्मिंदा होने की बात है । धमकियाँ ऐसी दीजिये कि उसे आप अकेले किसी चौराहे पर मेरे सामने दोहरा सके । प्यारे भीड़ पर इतना मत उछलो । भीड़ में उछलने की तुम्हारी इस कमज़ोरी को अपनी बाँहों में भर कर दूर कर दूँगा । आके गले मिलो और महसूस कर जाओ मैं कौन हूँ । 

अक्सर बोलने वाला ताक़तवर की तरह क्यों प्रदर्शित करता है । कौन लोग हैं जो इनबाक्स या ब्लाग के कमेंट में डराने की भाषा में बात कर जाते हैं । यह जाना पहचान दौर इतिहास में पहले भी गुज़रा है और ग़ायब हो गया है । आता रहता है और जाता रहता है । इसीलिए मैं सतर्क नहीं हूँ पर बेख़बर भी नहीं ।





विज्जी और बनारस

सफ़ेद मगर मटमैली हो चुकी इस मूर्ति को देख कर लगा कि अंबेडकर की है । हैरान मन तेज़ निगाह से देख रहा था कि आख़िर कौन हो सकता है जो बनारस के अस्सी घाट जाने के रास्ते पैड और बैट के साथ खड़ा है । कार रोक दी मैंने । तस्वीर लेने के लिए पीछे आ रही गाड़ियों की पीं पां झेलते हुए सड़क पार कर गया । ये तो विज्जी है । ऐसा नहीं कि मैं उन्हें पहचानता था पर मूर्ति के नीचे लिखा पढ़ कर मैं एक ऐसे बनारस में चला गया जिसकी बात ही कोई नहीं करता ।

मैंने अपनी ज़िंदगी में चंद राज्यों के ही शहर देखे हैं । कहीं किसी शहर में क्रिकेटर की मूर्ति नहीं देखी । बनारस में देखी । विज्जी और बनारस । हमने कभी विज्जी के बहाने बनारस के बारे में सोचा ही नहीं था । विजयनगरम के महाराज की मूर्ति । मूर्ति के नीचे लिखा पढ़ने लगा । काशी के मैदान में विज्जी की टीम ने एम सी सी इंग्लैंड की टीम को हराया था । बस इस एक सूचना ने बनारस के बारे में बार बार बनाई जा रही एकरसीय छवि को पलट दिया । मैं उस दौर में चला गया जब विज्जी की यह जीत बनारस को बताये बिना गुज़र गई होगी । तब क्रिकेट इतना लोकप्रिय था कहाँ । फिर भी कल्पना करने के पैसे नहीं लगते । कुछ तो होंगे जो भाग कर इस मैच को देखने गए होंगे । इस शहर के वे कौन से बड़े लोग रहे होंगे जिन्होंने उस मैच को देखा होगा । विज्जी को देखने वाले बनारसियों की स्मृतियाँ कहाँ दर्ज पड़ी होंगी । 



विज्जी न्याय मंत्री रहे हैं । विधानसभा के सदस्य रहे हैं । क्रिकेट बोर्ड के उपाध्यक्ष से लेकर अध्यक्ष तक रहे हैं । उन लोगों का शुक्रिया जिन्होंने अस्सी घाट जाने के रास्ते पर विज्जी की मूर्ति लगाई । मुझे नहीं मालूम कि किन लोगों ने यह मूर्ति लगाई और लगाने का इतिहास क्या है मगर बनारस के इतिहास के इस सफ़ेद पन्ने को देख मियाज़ हरिहर हो गया । विज्जी के बारे में ज़्यादा नहीं जानता लेकिन विज्जी ने मेरे लिए बनारस को नया कर दिया । जो लोग बनारस को जानने का दावा करते हैं दरअसल वो बनारस के बारे में उतना ही जानते हैं । बनारस आएं तो ऐसे टूरिस्ट गाइड टाइप बनारसियों से बचने से बचें जो बनारस के बारे में सब जानते हैं । बनारस को खुद की नज़र से देखिये । इस शहर के वजूद में सिर्फ बाबा फ़क़ीर और कबीर नहीं हैं विज्जी भी हैं ।